वंदे मातरम् न गाना अपराध नहीं? सुप्रीम कोर्ट ने धार्मिक आपत्ति पर कही बड़ी बात
धार्मिक वजह से राष्ट्रगीत न गाने पर कोर्ट की टिप्पणी
वंदे मातरम् से जुड़े मामले में सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को कहा कि धार्मिक कारणों से राष्ट्रगीत न गाने वाले व्यक्ति को आपराधिक कार्रवाई का सामना नहीं करना चाहिए। अदालत ने इस मामले में केंद्र सरकार से जवाब मांगा है। सुनवाई के दौरान कोर्ट ने यह भी जांचने पर सहमति जताई कि वंदे मातरम् न गाने को दंडनीय अपराध बनाया जा सकता है या नहीं।
मामला गायक टीएम कृष्णा की ओर से दाखिल याचिका से जुड़ा है। याचिका में वंदे मातरम् से जुड़े प्रावधानों को चुनौती दी गई है। सुनवाई के दौरान यह सवाल भी सामने आया कि राष्ट्रगीत के गायन से जुड़े नियमों को किस तरह लागू किया जाना चाहिए और धार्मिक कारणों को इस संदर्भ में किस तरह देखा जाए। सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी के बाद अब इस मामले में केंद्र सरकार का जवाब महत्वपूर्ण होगा। अदालत ने फिलहाल मामले में अंतिम निर्णय नहीं दिया है, बल्कि संबंधित कानूनी प्रावधानों और उनके प्रभाव पर जवाब मांगा है।
याचिकाकर्ता ने क्या तर्क दिया?
याचिकाकर्ता की ओर से दलील दी गई कि वंदे मातरम् के अंतिम चार पैरों में हिंदू देवताओं के प्रति भक्ति का आह्वान किया गया है। याचिकाकर्ता ने कहा कि इन पंक्तियों को गाना अनिवार्य बनाना देश की धर्मनिरपेक्षता के सिद्धांत का उल्लंघन होगा। याचिका में वंदे मातरम् को कानून के दायरे में लाने वाले संशोधन को भी चुनौती दी गई है। संबंधित संशोधन को राज्यसभा ने 29 जुलाई और लोकसभा ने 30 जुलाई को पारित किया था। इसके बाद 47 दिन पहले, यानी 6 अगस्त को राष्ट्रपति की मंजूरी मिलने पर यह कानून बना।याचिकाकर्ता की दलील का मुख्य आधार यह है कि किसी व्यक्ति को धार्मिक विश्वास के कारण राष्ट्रगीत गाने में आपत्ति हो सकती है। ऐसे में उसे केवल गीत न गाने के आधार पर आपराधिक कार्रवाई का सामना नहीं करना चाहिए। इसी मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से जवाब मांगा है।
कोर्ट में पुराने फैसले का भी जिक्र
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने 1986 के बिजो इमैनुएल बनाम केरल सरकार मामले में तय सिद्धांतों को लागू करने की बात कही। उस मामले में तीन छात्रों ने धार्मिक विश्वास के कारण राष्ट्रगान नहीं गाया था। हालांकि वे राष्ट्रगान के दौरान सम्मानपूर्वक खड़े रहते थे।
रिपोर्ट के मुताबिक, सुप्रीम कोर्ट ने उन छात्रों के खिलाफ की गई कार्रवाई को रद्द करते हुए कहा था कि केवल राष्ट्रगान नहीं गाने के आधार पर उन्हें दंडित नहीं किया जा सकता। इसी पुराने फैसले के सिद्धांतों को मौजूदा मामले में भी देखा जा रहा है। इससे मौजूदा विवाद में धार्मिक विश्वास और राष्ट्रगीत से जुड़े कानूनी प्रावधानों के बीच संबंध महत्वपूर्ण हो गया है। अदालत यह देख रही है कि धार्मिक कारणों से किसी व्यक्ति द्वारा वंदे मातरम् न गाने की स्थिति में आपराधिक कार्रवाई का प्रावधान किस तरह लागू हो सकता है।
राष्ट्रगीत की पंक्तियों को लेकर भी विवाद
याचिकाकर्ता ने अदालत के सामने वंदे मातरम् की अंतिम चार पंक्तियों को लेकर अपनी आपत्ति रखी। उनका कहना है कि इन पंक्तियों में हिंदू देवताओं के प्रति भक्ति का आह्वान किया जाता है। इसी आधार पर याचिकाकर्ता ने सवाल उठाया कि इन पंक्तियों को गाना अनिवार्य करना देश की धर्मनिरपेक्षता के सिद्धांत के अनुरूप कैसे हो सकता है।
सुनवाई में यह मुद्दा भी सामने आया कि वंदे मातरम् को केवल दो अंतरों तक सीमित रखा जाएगा या छह अंतरों तक। कोर्ट ने इस सवाल पर अभी कोई अंतिम फैसला नहीं किया है। अदालत ने इस मुद्दे पर भी निर्णय देने से इनकार किया कि राष्ट्रगीत के रूप में कितने अंतरों को शामिल किया जाना चाहिए। इस तरह मौजूदा मामला केवल गीत गाने या न गाने तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके साथ जुड़े कानूनी प्रावधानों और धार्मिक विश्वास से संबंधित सवालों पर भी केंद्रित है।
अब केंद्र सरकार के जवाब का इंतजार
सुप्रीम कोर्ट ने मामले में केंद्र सरकार से जवाब मांगा है। इसके बाद अदालत संबंधित कानूनी प्रावधानों और याचिकाकर्ता की दलीलों पर आगे सुनवाई करेगी। फिलहाल अदालत की टिप्पणी धार्मिक कारणों से राष्ट्रगीत न गाने वाले व्यक्ति के खिलाफ आपराधिक कार्रवाई के सवाल पर है। इसे मामले का अंतिम फैसला नहीं माना जा सकता। आगे की सुनवाई में केंद्र सरकार का पक्ष और अदालत के सामने रखे जाने वाले कानूनी तर्क महत्वपूर्ण होंगे। इस मामले में एक तरफ राष्ट्रगीत से जुड़े नियम और दूसरी तरफ धार्मिक विश्वास से जुड़े अधिकारों का सवाल है। सुप्रीम कोर्ट इन्हीं पहलुओं को ध्यान में रखते हुए मामले की सुनवाई कर रहा है।
