FMCG Q2 Growth: सितंबर तिमाही में एफएमसीजी ग्रोथ फिसलकर 3.6% रही, बड़ी कंपनियों को मिला फायदा
ग्रामीण मांग में कमजोरी से वॉल्यूम ग्रोथ 3.6% पर सिमटी
दैनिक उपभोग की वस्तुएं बनाने वाले फास्ट-मूविंग कंज्यूमर गुड्स (FMCG) सेक्टर के लिए चालू वित्त वर्ष की सितंबर तिमाही (दूसरी तिमाही) काफी चुनौतीपूर्ण साबित हुई है। ग्रामीण भारत में उपभोक्ता मांग की सुस्त रफ्तार और उत्पादन लागत में हुई तेज बढ़ोतरी के कारण उद्योग की कुल बिक्री मात्रा (वॉल्यूम ग्रोथ) में उल्लेखनीय गिरावट दर्ज की गई है।
बाजार शोध एजेंसी ‘वर्ल्डपैनल बाय न्यूमरेटर’ (Worldpanel by Numerator) द्वारा जारी किए गए ताजा संकलित आंकड़ों के अनुसार, सितंबर तिमाही के दौरान संपूर्ण एफएमसीजी सेक्टर की कुल सेल्स वॉल्यूम ग्रोथ घटकर मात्र 3.6 प्रतिशत रह गई, जो ठीक एक वर्ष पहले समान तिमाही में 4.7 प्रतिशत दर्ज की गई थी। इस समग्र गिरावट के बावजूद संगठित और बड़ी कॉरपोरेट कंपनियों ने अपने मजबूत वितरण नेटवर्क के दम पर बेहतरीन प्रदर्शन किया, जबकि गैर-ब्रांडेड और छोटी क्षेत्रीय इकाइयों के सामने अस्तित्व का संकट खड़ा हो गया। इस प्रकार एफएमसीजी सेक्टर ग्रोथ सुस्ती ने उद्योग के भीतर बड़े और छोटे खिलाड़ियों के बीच की खाई को और चौड़ा कर दिया है।
एचयूएल, मैरिको और गोदरेज ने दर्ज की मजबूत वृद्धि
उद्योग की सामान्य मंदी के विपरीत शेयर बाजार में सूचीबद्ध दिग्गज एफएमसीजी कंपनियों ने अपने तिमाही वित्तीय परिणामों में शानदार मजबूती दिखाई है। आंकड़ों के अनुसार, देश की सबसे बड़ी कंज्यूमर कंपनी हिंदुस्तान यूनिलीवर लिमिटेड (HUL) की वॉल्यूम ग्रोथ 7 प्रतिशत रही, जबकि पैराशूट और सफोला ब्रांड बनाने वाली मैरिको (Marico) के कारोबार में 10 प्रतिशत की ठोस वृद्धि दर्ज हुई।
इसी प्रकार गोदरेज कंज्यूमर प्रोडक्ट्स लिमिटेड (GCPL) की घरेलू बिक्री पिछले साल के मुकाबले 14 प्रतिशत उछल गई, वहीं नेस्ले इंडिया ने भी पैकेज्ड फूड्स की दम पर डबल डिजिट (दोहरे अंकों) में वॉल्यूम ग्रोथ हासिल की। विश्लेषकों का कहना है कि महंगाई के इस दौर में उपभोक्ताओं ने गुणवत्ता और स्थिरता के लिए स्थापित बड़े ब्रांड्स पर अधिक भरोसा जताया, जिससे बड़ी कंपनियों का मार्केट शेयर बढ़ गया। एफएमसीजी सेक्टर ग्रोथ सुस्ती के बीच बड़ी कंपनियों का यह प्रदर्शन उनकी वित्तीय दृढ़ता को प्रमाणित करता है।
छोटी और क्षेत्रीय कंपनियों पर लागत और सप्लाई चेन का दोहरा दबाव
बिस्कुट निर्माता प्रमुख कंपनी पारले प्रोडक्ट्स के वाइस प्रेसिडेंट मयंक शाह ने उद्योग की स्थिति का विश्लेषण करते हुए बताया कि अधिकांश उत्पाद श्रेणियों में छोटी और स्थानीय कंपनियां बड़े ब्रांड्स के हाथों अपना पुराना बाजार आधार तेजी से खो रही हैं। शाह ने कहा कि इसका सबसे गंभीर दबाव ग्रामीण बाजारों में महसूस किया जा रहा है, जहां पारंपरिक रूप से स्थानीय कंपनियां काम करती आई हैं। बड़ी कंपनियों की तुलना में छोटी फर्मों के पास सीमित वित्तीय संसाधन होते हैं, जिससे वे पैकेजिंग सामग्री, वाणिज्यिक गैस और पाम ऑयल जैसी इनपुट लागत में अचानक हुई वृद्धि का सामना करने में असमर्थ साबित हो रही हैं।
उधर मैरिको के प्रबंध निदेशक (MD) सौगत गुप्ता ने स्पष्ट किया कि जब भी आपूर्ति श्रृंखला बाधित होती है और मुद्रास्फीति बढ़ती है, तो पैकेट का आकार (ग्रामेज) घटाने या कीमतें बढ़ाने की क्षमता केवल बड़े ब्रांड्स के पास होती है। छोटी कंपनियों की इन्वेंट्री अटक जाने से उन्हें भारी नुकसान उठाना पड़ा है। इस प्रकार एफएमसीजी सेक्टर ग्रोथ सुस्ती ग्रामीण अर्थव्यवस्था में क्रय शक्ति की असमानता को उजागर कर रही है।
