अमेरिका का बड़ा फैसला: भारतीय IT कंपनियों और Microsoft के ग्रीन कार्ड प्रोग्राम पर रोक

अमेरिका ग्रीन कार्ड प्रोग्राम और भारतीय आईटी कंपनियों पर निलंबन के संभावित असर को दर्शाती तस्वीर

ट्रंप प्रशासन का बड़ा फैसला, Microsoft समेत IT कंपनियों पर कार्रवाई

वाशिंगटन: ट्रंप प्रशासन ने भारतीय आईटी सेक्टर और अमेरिकी टेक जगत को बड़ा झटका देते हुए माइक्रोसॉफ्ट समेत कई दिग्गज भारतीय आईटी कंपनियों को एक अहम इमिग्रेशन प्रोग्राम से अनिश्चितकाल के लिए निलंबित कर दिया है। अमेरिकी प्रशासन ने इन कंपनियों पर विदेशी कर्मचारियों से जुड़े वीजा सिस्टम के व्यापक और संगठित दुरुपयोग का आरोप लगाया है।

वाशिंगटन में एक ब्रीफिंग के दौरान अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने कड़ा रुख अपनाते हुए कहा, “दुर्भाग्य से पूरे अमेरिका में ऐसी कोई दूसरी कंपनी नहीं है जिसने इस सिस्टम का माइक्रोसॉफ्ट से ज्यादा दुरुपयोग किया हो।” वेंस ने स्पष्ट किया कि आवेदन प्रक्रिया के दौरान गलत और भ्रामक जानकारी देना बुनियादी तौर पर गैर-कानूनी और धोखाधड़ी है।

श्रम मंत्री कीथ सोंडरलिंग के अनुसार, ‘परमानेंट लेबर सर्टिफिकेशन’ (PERM) प्रोग्राम से निलंबित की गई कंपनियों में प्रमुख रूप से निम्नलिखित कंपनियां शामिल हैं:

  • टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज (TCS)
  • इंफोसिस (Infosys)
  • विप्रो (Wipro)
  • एचसीएल टेक्नोलॉजीज (HCLTech)
  • कॉग्निजेंट (Cognizant)
  • कैपजेमिनी (Capgemini)
  • माइक्रोसॉफ्ट (Microsoft)

प्रशासन ने यह भी पुष्टि की है कि इस मामले में कई सक्रिय संघीय जांच (Federal Investigations) जारी हैं। यह रोक तब तक प्रभावी रहेगी, जब तक प्रशासन की चिंताओं का पूर्ण समाधान नहीं हो जाता।

फैसले की खबर से टेक शेयरों में गिरावट

इस फैसले की खबर आते ही टेक शेयरों में भारी बिकवाली देखी गई। न्यूयॉर्क में ट्रेडिंग के दौरान इंफोसिस और विप्रो के अमेरिकन डिपॉजिटरी रिसीट्स (ADR) 3.5% से अधिक टूट गए, जबकि कॉग्निजेंट के शेयर में करीब 1.4% की गिरावट दर्ज की गई। माइक्रोसॉफ्ट के शेयरों में भी शुरुआती बढ़त खत्म हो गई।

इस घटनाक्रम ने भारतीय आईटी कंपनियों और अमेरिकी टेक सेक्टर पर संभावित प्रभाव को लेकर चर्चा बढ़ा दी है। खास तौर पर उन कंपनियों और कर्मचारियों के लिए यह मामला महत्वपूर्ण हो सकता है, जिनकी रोजगार-आधारित स्थायी निवास प्रक्रिया अमेरिका में चल रही है। हालांकि, शेयर बाजार में आई गिरावट और कंपनियों के इमिग्रेशन प्रोग्राम से जुड़े निलंबन का दीर्घकालिक असर इस बात पर निर्भर करेगा कि रोक कितने समय तक जारी रहती है और प्रशासन की चिंताओं का समाधान किस तरह होता है।

अमेरिका ग्रीन कार्ड प्रक्रिया पर क्या होगा असर?

अमेरिका ग्रीन कार्ड से जुड़ी प्रक्रिया पर इस निलंबन का संभावित असर सबसे महत्वपूर्ण पहलुओं में से एक है। PERM रोजगार-आधारित स्थायी निवास (Employment-based Green Card) की पहली और सबसे अनिवार्य सीढ़ी है। इस रोक के बाद इन कंपनियों में कार्यरत विदेशी कर्मचारी, विशेषकर भारतीय कर्मचारी, अपनी स्थायी निवास प्रक्रिया को आगे बढ़ाने में परेशानी का सामना कर सकते हैं। पहले से लंबित मामलों की प्रगति भी रुकने की आशंका है।

PERM प्रक्रिया का महत्व इसलिए भी अधिक है, क्योंकि रोजगार के आधार पर ग्रीन कार्ड प्राप्त करने के इच्छुक कई कर्मचारियों के लिए यह एक अहम चरण होता है। यदि इस प्रक्रिया पर लंबे समय तक रोक बनी रहती है, तो कर्मचारियों की भविष्य की योजनाएं प्रभावित हो सकती हैं। इस स्थिति में कर्मचारियों को अपने इमिग्रेशन मामलों की स्थिति, निलंबन के दायरे और आगे उपलब्ध विकल्पों को समझना होगा। कंपनियों के लिए भी प्रभावित कर्मचारियों की स्थिति का आकलन करना महत्वपूर्ण हो सकता है।

H-1B वीजा धारकों पर संकट और ‘Max Out’ का जोखिम

इस फैसले का एक संभावित असर H-1B वीजा पर काम कर रहे विदेशी कर्मचारियों पर भी पड़ सकता है। H-1B वीजा आमतौर पर अधिकतम छह साल के लिए वैध होता है। छह साल की सीमा के बाद इसे केवल तभी आगे बढ़ाया जा सकता है, जब कर्मचारी की ग्रीन कार्ड प्रक्रिया (PERM/I-140) स्वीकृत या प्रक्रियाधीन हो। यदि PERM प्रक्रिया अनिश्चितकाल के लिए बंद रहती है, तो समय सीमा पूरी होने पर कई वरिष्ठ भारतीय इंजीनियरों को अमेरिका छोड़ना पड़ सकता है।

इस वजह से उन कर्मचारियों की चिंताएं बढ़ सकती हैं, जो लंबे समय से अमेरिकी कंपनियों में काम कर रहे हैं और स्थायी निवास की प्रक्रिया पूरी होने का इंतजार कर रहे हैं। ऐसे कर्मचारियों के लिए वीजा की समय सीमा और ग्रीन कार्ड आवेदन की स्थिति महत्वपूर्ण हो सकती है। हालांकि, अलग-अलग कर्मचारियों की इमिग्रेशन स्थिति और उपलब्ध विकल्प अलग हो सकते हैं। इसलिए इस संभावित प्रभाव को सभी H-1B वीजा धारकों पर समान रूप से लागू मानना उचित नहीं होगा।

टैलेंट रिटेंशन और नई हायरिंग में कंपनियों की चुनौतियां

अमेरिका में काम करने वाली टेक कंपनियों के लिए स्थायी निवास की संभावना विदेशी प्रतिभाओं को आकर्षित करने और उन्हें लंबे समय तक अपने साथ बनाए रखने का एक महत्वपूर्ण पहलू हो सकती है। शीर्ष टेक प्रतिभाएं अक्सर स्थायी निवास की संभावना को ध्यान में रखकर इन कंपनियों में काम करती हैं। इस निलंबन से कंपनियों के लिए वरिष्ठ डेवलपर्स और आर्किटेक्ट्स को रोके रखना (Retention) बेहद कठिन हो सकता है।

ऐसी स्थिति में कर्मचारी उन कंपनियों का रुख कर सकते हैं, जो इस निलंबन के दायरे में नहीं हैं। इससे प्रभावित कंपनियों को अपने कर्मचारियों को बनाए रखने और नई प्रतिभाओं की भर्ती करने में अतिरिक्त चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है। विशेष रूप से अनुभवी इंजीनियरों और तकनीकी विशेषज्ञों को लेकर कंपनियों की रणनीति प्रभावित हो सकती है। यदि कर्मचारियों को स्थायी निवास की प्रक्रिया में अनिश्चितता का सामना करना पड़ता है, तो वे अपने करियर और भविष्य के लिए दूसरे विकल्पों पर विचार कर सकते हैं।

कंपनियों की परिचालन लागत और मुनाफे पर संभावित असर

इस निलंबन का एक अन्य संभावित प्रभाव कंपनियों की परिचालन लागत (Operating Costs) पर पड़ सकता है। यदि अमेरिकी कंपनियों को अनिवार्य रूप से स्थानीय अमेरिकी नागरिकों को ही उच्च वेतन पर नियुक्त करना पड़ा, तो उनकी लेबर कॉस्ट काफी बढ़ सकती है। इसका सीधा असर कंपनियों के ऑपरेटिंग मार्जिन और तिमाही मुनाफे पर दिख सकता है। कर्मचारियों की भर्ती, उन्हें बनाए रखने और परियोजनाओं को समय पर पूरा करने की लागत कंपनियों के लिए महत्वपूर्ण विषय बन सकती है।

यदि कंपनियों को अपनी मौजूदा भर्ती योजनाओं में बदलाव करना पड़ता है, तो उन्हें कर्मचारियों की उपलब्धता और परियोजनाओं की जरूरतों के बीच संतुलन बनाना होगा। इसके लिए नई नियुक्तियों, कार्यस्थल की व्यवस्था और तकनीकी टीमों के प्रबंधन से जुड़ी रणनीतियों में बदलाव की जरूरत पड़ सकती है। हालांकि, परिचालन लागत और मुनाफे पर वास्तविक असर कितना होगा, यह कंपनियों की परिस्थितियों और निलंबन की अवधि पर निर्भर करेगा।

ऑफशोरिंग और भारत में टेक सेक्टर के विस्तार को मिल सकता है बढ़ावा

अमेरिका में काम करने के विकल्प सीमित होने पर कंपनियां भारत, पूर्वी यूरोप या लैटिन अमेरिका स्थित अपने ग्लोबल कैपेबिलिटी सेंटर्स (GCCs) और डेवलपमेंट सेंटर्स में काम ट्रांसफर करने की प्रक्रिया तेज कर सकती हैं। इससे भारत में मौजूद टेक हब्स, जैसे बेंगलुरु, हैदराबाद और पुणे में उच्च स्तरीय प्रोजेक्ट्स की संख्या बढ़ सकती है। यदि कंपनियां अपने कुछ कामकाज को अमेरिकी कार्यालयों से दूसरे देशों में स्थानांतरित करने का फैसला करती हैं, तो भारत में तकनीकी टीमों की भूमिका बढ़ने की संभावना बन सकती है।

भारतीय आईटी कंपनियों के लिए यह स्थिति एक ओर अमेरिका में कर्मचारियों की नियुक्ति और इमिग्रेशन प्रक्रिया से जुड़ी चुनौतियां पैदा कर सकती है, वहीं दूसरी ओर भारत में मौजूद डेवलपमेंट सेंटर्स के विस्तार के अवसर भी सामने ला सकती है। हालांकि, ऑफशोरिंग में कितनी तेजी आएगी और भारत के टेक हब्स को कितना लाभ होगा, यह कंपनियों के व्यावसायिक फैसलों, परियोजनाओं की जरूरतों और अमेरिकी प्रशासन के अगले कदमों पर निर्भर करेगा।

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