इस्कॉन मंदिर में भोग-भोजन बनाने 10 एकड़ में जैविक खेती

इस्कॉन मंदिर में 10 एकड़ जमीन पर जैविक खेती

10 एकड़ जमीन पर हो रही जैविक खेती

रायसेन रोड पर रमाखेड़ी गांव के पास स्थित इस्कॉन मंदिर में आस्था के साथ पर्यावरण संरक्षण को जोड़ने की पहल की जा रही है। यहां करीब 10 एकड़ जमीन में जैविक खेती की जा रही है। इस जमीन पर अनाज और सब्जियां उगाई जाती हैं। खेत में तैयार होने वाले अनाज और सब्जियों का इस्तेमाल भगवान के भोग से लेकर मंदिर के सेवकों के भोजन तक किया जाता है।

मंदिर परिसर में जैविक खेती के जरिए भोजन तैयार करने की प्रक्रिया को प्राकृतिक तरीके से आगे बढ़ाया जा रहा है। इस खेती का पूरा काम इस्कॉन के सेवक खुद करते हैं। खेती के लिए प्राकृतिक खाद और कीट नियंत्रण के लिए भी प्राकृतिक चीजों का इस्तेमाल किया जाता है। इस तरह इस्कॉन मंदिर जैविक खेती के माध्यम से धार्मिक गतिविधियों को पर्यावरण संरक्षण और प्राकृतिक कृषि से जोड़ रहा है।

भगवान के भोग से सेवकों के भोजन तक इस्तेमाल

इस खेत में तैयार होने वाली फसल का इस्तेमाल सिर्फ मंदिर से जुड़े एक काम के लिए नहीं होता। यहां उगाया गया अनाज और सब्जियां भगवान के भोग के लिए इस्तेमाल की जाती हैं। इसके अलावा सेवकों के भोजन में भी इसी खेती से प्राप्त उपज का उपयोग किया जाता है। इस्कॉन मंदिर के प्रभारी स्वामी अच्युतदास का कहना है कि कृषि मानवता और प्रकृति के संरक्षण का प्रमुख माध्यम है। उनके अनुसार जैसा अन्न होगा, वैसा ही मन और जीवन पर प्रभाव पड़ेगा। इसी सोच के तहत मंदिर में खेती को केवल उत्पादन की प्रक्रिया के रूप में नहीं, बल्कि प्रकृति से जुड़ाव के माध्यम के रूप में आगे बढ़ाया जा रहा है। इस्कॉन मंदिर जैविक खेती में मंदिर के सेवक खुद खेती का काम करते हैं और उन्हें जैविक खेती तथा खाद निर्माण का प्रशिक्षण भी दिया गया है।

गोबर, गोमूत्र और प्राकृतिक चीजों से तैयार होती है खाद

खेती के लिए यहां रासायनिक खाद पर निर्भरता के बजाय प्राकृतिक चीजों का इस्तेमाल किया जाता है। गोबर, गोमूत्र, गुड़, सरसों की खली और उड़द के आटे जैसी चीजों से जैविक खाद तैयार की जाती है। इससे खेत में इस्तेमाल होने वाली खाद को प्राकृतिक तरीके से तैयार किया जाता है। कीट नियंत्रण के लिए भी प्राकृतिक विकल्प अपनाए जाते हैं। इसके लिए नीम का तेल, नीम की पत्तियों का बुरादा और खट्टी छाछ जैसी चीजों का इस्तेमाल किया जाता है। खेती में आसपास की गोशालाओं से गोबर मंगाया जाता है। इस पूरी प्रक्रिया में इस्कॉन के सेवकों की भागीदारी रहती है। सेवकों को जैविक खेती के साथ-साथ खाद तैयार करने का प्रशिक्षण भी दिया गया है, ताकि खेत में इस्तेमाल होने वाली सामग्री को प्राकृतिक तरीके से तैयार किया जा सके।

रोज करीब 60 सेवकों के लिए तैयार होता है भोजन

इस्कॉन मंदिर की रसोई में रोज करीब 60 सेवकों के लिए भोजन तैयार किया जाता है। ऐसे में मंदिर से जुड़ी जैविक खेती का उद्देश्य केवल खेती करना नहीं है, बल्कि मंदिर की भोजन व्यवस्था में भी इसका उपयोग करना है। खेत में तैयार होने वाली फसल मंदिर की जरूरत के अनुसार उपयोग में लाई जाती है। इसमें भगवान के भोग के साथ-साथ सेवकों के भोजन के लिए अनाज और सब्जियां शामिल हैं। खेती से लेकर खाद तैयार करने तक का काम सेवकों की भागीदारी से किया जा रहा है।

इस पहल के जरिए धार्मिक आस्था, भोजन और पर्यावरण के बीच संबंध को सामने लाने की कोशिश की जा रही है। मंदिर से जुड़े लोगों के अनुसार खेती प्रकृति और मानव जीवन के बीच संबंध का एक महत्वपूर्ण माध्यम है। इस्कॉन मंदिर जैविक खेती के जरिए इसी सोच को व्यवहार में उतारने का प्रयास किया जा रहा है।

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