Crude Oil Price Crash: कच्चे तेल में 9% की भारी गिरावट, 94 डॉलर के नीचे आया ब्रेंट क्रूड

कच्चे तेल में भारी गिरावट के बाद अंतरराष्ट्रीय तेल रिफाइनरी और गिरता डॉलर ग्राफ

दो महीने के सबसे निचले स्तर पर फिसली तेल की कीमतें

अमेरिका के मध्यावधि चुनावों में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की करारी पराजय और संसद के दोनों सदनों में डेमोक्रेटिक पार्टी का पूर्ण नियंत्रण स्थापित होने के बाद अंतरराष्ट्रीय कमोडिटी बाजार में अप्रत्याशित हलचल देखी गई। अमेरिकी चुनाव परिणामों के तुरंत बाद वैश्विक स्तर पर कच्चे तेल की कीमतों में करीब 9 प्रतिशत की भारी एकदिनी गिरावट दर्ज की गई, जिससे तेल के भाव पिछले दो महीनों के सबसे निचले स्तर पर पहुंच गए।

बुधवार को शुरू हुई इस बिकवाली का क्रम गुरुवार को भी जारी रहा और ब्रेंट क्रूड ऑयल 1 फीसदी से ज्यादा टूटकर 94 डॉलर प्रति बैरल के महत्वपूर्ण समर्थन स्तर से नीचे फिसल गया। बीते एक सप्ताह के भीतर कच्चे तेल की वैश्विक कीमतों में कुल 16 प्रतिशत की भारी गिरावट आ चुकी है। इस अचानक आई कच्चे तेल में भारी गिरावट ने दुनिया भर की ऊर्जा आयात करने वाली अर्थव्यवस्थाओं को बहुत बड़ा संबल दिया है।

ब्रेंट क्रूड 94 डॉलर और डब्ल्यूटीआई 86 डॉलर पर आया

ताजा अंतरराष्ट्रीय वायदा कारोबार में वैश्विक बेंचमार्क ब्रेंट क्रूड 0.80 फीसदी की कमजोरी के साथ 93.80 डॉलर प्रति बैरल के आसपास कारोबार करता नजर आया। वहीं अमेरिकी बेंचमार्क वेस्ट टेक्सास इंटरमीडिएट (WTI) क्रूड भी 1.36 प्रतिशत लुढ़ककर 86.92 डॉलर प्रति बैरल के स्तर पर आ गया। इसके अनुरूप भारत द्वारा आयात किए जाने वाले विभिन्न ग्रेड्स के मिश्रण ‘इंडियन क्रूड बास्केट’ के भाव में भी 10 फीसदी की जोरदार गिरावट दर्ज की गई और यह घटकर 107 डॉलर प्रति बैरल पर आ गया।

दरअसल, पिछले कई महीनों से पश्चिम एशिया में इजराइल-ईरान सैन्य टकराव के कारण आपूर्ति बाधित होने की आशंका से तेल के भाव लगातार 100 से 115 डॉलर के ऊंचे दायरे में बने हुए थे। लेकिन डेमोक्रेट्स की जीत के बाद अमेरिकी विदेश नीति में आक्रामकता घटने और तेहरान के साथ कूटनीतिक समझौते की संभावना बढ़ने से बाजार से युद्ध का रिस्क-प्रीमियम तेजी से खत्म हुआ है। यही कारण रहा कि कच्चे तेल में भारी गिरावट का यह सिलसिला तेज हो गया।

भारत को प्रति डॉलर गिरावट पर 18,000 करोड़ की बचत

यह गिरावट भारतीय अर्थव्यवस्था और सरकार के राजकोषीय प्रबंधन के लिए एक वरदान की तरह साबित हुई है। भारत अपनी आवश्यकता का लगभग 90 प्रतिशत कच्चा तेल विदेशी बाजारों से आयात करता है और कच्चा तेल देश का सबसे बड़ा आयात मद है। पेट्रोलियम मंत्रालय के स्थापित वित्तीय मानकों के अनुसार, अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल के भाव में मात्र 1 डॉलर प्रति बैरल की कमी आने से भारत का वार्षिक तेल आयात बिल करीब 18,000 करोड़ रुपये घट जाता है।

पिछले वित्तीय चक्र में भारत ने 137 अरब डॉलर का कच्चा तेल खरीदा था, जबकि चालू वर्ष में अप्रैल से सितंबर के दौरान ही तेल आयात बिल 90.6 अरब डॉलर तक पहुंच गया था। तेल कीमतों में इस तेज गिरावट से देश का चालू खाता घाटा (CAD) नियंत्रण में रहेगा, घरेलू मुद्रास्फीति घटेगी और पेट्रोल-डीजल की कीमतों में स्थिरता बनी रहेगी। हालांकि, गोल्डमैन सैश जैसी वैश्विक निवेश फर्म्स ने चेतावनी दी है कि यदि ओपेक देशों ने उत्पादन घटाया तो कीमतें फिर चढ़ सकती हैं, लेकिन वर्तमान में कच्चे तेल में भारी गिरावट ने भारत को भारी आर्थिक राहत प्रदान की है।

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