UPSC के 100 साल, मोदी बोले- ये गवर्नेस तय करता है; संस्था के पहले अध्यक्ष अंग्रेज थे

UPSC के 100 साल पूरे होने पर भारत मंडपम में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गुरुवार को संघ लोक सेवा आयोग यानी UPSC के 100 साल पूरे होने के अवसर पर आयोजित कार्यक्रम में हिस्सा लिया। भारत मंडपम में आयोजित कार्यक्रम के दौरान प्रधानमंत्री ने आयोग की ऐतिहासिक यात्रा, इसके बदलते स्वरूप और विकसित भारत के निर्माण में इसकी भूमिका पर बात की। प्रधानमंत्री ने कहा कि विकसित भारत के लिए जिस तरह की गवर्नेस चाहिए, उसका माध्यम UPSC है। उन्होंने भर्ती होने वाले युवाओं के लिए दो महत्वपूर्ण कसौटियों का भी उल्लेख किया।

प्रधानमंत्री के मुताबिक उम्मीदवारों में पहली कसौटी नेशन फर्स्ट और दूसरी सिटिजन्स फर्स्ट की होनी चाहिए। उन्होंने कहा कि इन्हीं दो भावों के आधार पर उम्मीदवारों को परखा जाएगा और उनका चयन होने पर राष्ट्रीय लक्ष्यों को हासिल करना आसान होगा। इस दौरान उन्होंने यह भी कहा कि एक समय सरकार को माई-बाप माना जाता था, लेकिन आज मंत्र नागरिक देवोभवः का है। यानी देश का नागरिक हमारे लिए किसी देव से कम नहीं है और नागरिकों की सेवा सर्वोपरि है।

शताब्दी समारोह में ऐतिहासिक फैसलों पर किताब का लोकार्पण

कार्यक्रम में प्रधानमंत्री ने आयोग से जुड़े 100 ऐतिहासिक फैसलों पर आधारित किताब का लोकार्पण किया। इसके साथ ही शताब्दी स्मारक सिक्का और विशेष डाक टिकट भी जारी किया गया। इस अवसर पर आयोग की 100 साल की यात्रा को सामने रखने वाली सामग्री और गैलरी का भी उल्लेख किया गया। प्रधानमंत्री ने आयोग के लंबे इतिहास को याद करते हुए कहा कि संस्था के इतिहास में कई बदलाव हुए हैं। उन्होंने बताया कि आयोग हर साल इंजीनियरिंग, मेडिकल, डिफेंस समेत करीब 250 भर्ती परीक्षाएं कराता है। समय के साथ सरकार, टेक्नोलॉजी और सिलेबस बदले हैं, लेकिन संस्था पर लोगों का भरोसा आज भी मजबूत है।

संस्था के पहले अध्यक्ष अंग्रेज थे

प्रधानमंत्री ने UPSC की ऐतिहासिक यात्रा का जिक्र करते हुए बताया कि संस्था के पहले अध्यक्ष सर रॉस बार्कर थे। उनका कार्यकाल 1926 से 1932 तक रहा। उन्होंने संस्था के इतिहास में हुए बदलावों की चर्चा करते हुए बताया कि 100 साल की इस यात्रा में इसका नाम दो बार बदला जा चुका है। उन्होंने यह भी कहा कि 1920 में सुभाष चंद्र बोस जब इस प्रक्रिया यानी आईसीएस से गुजरे थे, तब इसकी पूरी जानकारी गैलरी में मौजूद है। उस समय अंग्रेजों की हुकूमत थी, लेकिन संस्कृत का पेपर भी होता था और सुभाष चंद्र बोस ने संस्कृत में पेपर लिखा था। इस उदाहरण के जरिए उन्होंने संस्था की पुरानी परीक्षा व्यवस्था और उस दौर की परिस्थितियों का उल्लेख किया।

100 साल में बदली सरकार, तकनीक और सिलेबस

प्रधानमंत्री ने कहा कि पिछले 100 सालों में पीढ़ियां बदलीं, सरकारें बदलीं, तकनीक बदली और सिलेबस में भी बदलाव हुए। इसके बावजूद UPSC पर भरोसा आज भी उतना ही मजबूत है। उन्होंने इस 100 साल की यात्रा को एक उत्सव बताया और कहा कि लाखों-लाख स्टूडेंट्स इस संस्था से जुड़ी परीक्षाओं में शामिल होते रहे हैं। इस दौरान उन्होंने कहा कि संस्था की यात्रा केवल परीक्षा या भर्ती की यात्रा नहीं है, बल्कि इसका संबंध देश के प्रशासन और शासन व्यवस्था से भी है। आज जो युवा भर्ती होकर प्रशासनिक व्यवस्था में जाएंगे, वे विकसित भारत के निर्माण में अपनी भूमिका निभाएंगे।

विकसित भारत के लिए दो कसौटियों पर जोर

प्रधानमंत्री ने विकसित भारत के लिए जिस गवर्नेस की जरूरत बताई, उसमें उन्होंने दो बातों को महत्वपूर्ण बताया। पहली कसौटी नेशन फर्स्ट और दूसरी सिटिजन्स फर्स्ट है। उनके अनुसार उम्मीदवारों को इन दोनों भावों के आधार पर परखा जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि अगर ऐसे उम्मीदवारों का चयन होगा जो राष्ट्र और नागरिक दोनों को प्राथमिकता देंगे, तो राष्ट्रीय लक्ष्यों को हासिल करना आसान होगा। उन्होंने यह भी कहा कि नागरिकों की सेवा सर्वोपरि है। इसी विचार को उन्होंने 21वीं सदी के भारत की नई कार्य संस्कृति से जोड़ा।

प्रो पीपल, प्रो एक्टिव और गुड गवर्नेंस

प्रधानमंत्री ने विकसित भारत की कार्य संस्कृति के लिए तीन सिद्धांतों का उल्लेख किया- प्रो पीपल, प्रो एक्टिव और गुड गवर्नेंस। प्रो पीपल का मतलब नागरिकों के हितों को सर्वोपरि रखते हुए काम करना बताया गया। प्रो एक्टिव का अर्थ समस्या आने के बाद केवल कार्रवाई करने के बजाय समस्या को पहले से समझकर उसका समाधान तैयार करना है। उन्होंने कहा कि आज 21वीं सदी का भारत नई कार्य संस्कृति के साथ आगे बढ़ रहा है।

इसी संदर्भ में UPSC के माध्यम से भर्ती होने वाले युवाओं की भूमिका महत्वपूर्ण बताई गई। प्रधानमंत्री ने कहा कि आज जिन युवाओं की भर्ती की जा रही है, वे विकसित भारत के निर्माण में भूमिका निभाएंगे। इस तरह UPSC शताब्दी के मौके पर प्रधानमंत्री ने संस्था की 100 साल की यात्रा के साथ-साथ आने वाले समय में प्रशासनिक व्यवस्था के लिए जरूरी सोच पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि बदलती परिस्थितियों के बीच भी नागरिक सेवा, राष्ट्र प्रथम और बेहतर गवर्नेस की भावना को केंद्र में रखना जरूरी है।

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