एमपी आयुष्मान योजना पर नया पेंच, 1 अक्टूबर से NABH सर्टिफिकेट अनिवार्य; निजी अस्पतालों पर संकट
1 अक्टूबर से लागू हुई नई व्यवस्था
भोपाल समेत मध्य प्रदेश के चार प्रमुख शहरों में आयुष्मान भारत निरामयम योजना से जुड़े अस्पतालों के लिए 1 अक्टूबर से नई व्यवस्था लागू हो गई है। भोपाल, इंदौर, ग्वालियर और जबलपुर में योजना के तहत अस्पतालों की संबद्धता के लिए नेशनल एक्रेडिटेशन बोर्ड फॉर हॉस्पिटल्स एंड हेल्थकेयर प्रोवाइडर्स यानी NABH का प्रमाणपत्र जरूरी होगा। यह व्यवस्था पहले 1 अप्रैल से लागू होनी थी, लेकिन अस्पतालों को छह महीने की मोहलत दी गई थी। अब यह अतिरिक्त समय पूरा होने के बाद नई शर्त प्रभावी हो गई है।
नेशनल हेल्थ अथॉरिटी के उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार इन चार शहरों में आयुष्मान योजना से 739 अस्पताल जुड़े हुए हैं। इनमें से 310 अस्पतालों के पास NABH प्रमाणपत्र मौजूद है। सरकारी अस्पतालों को अलग कर देखें तो करीब 300 निजी अस्पताल ऐसे हैं, जिनकी संबद्धता नई शर्त से प्रभावित हो सकती है। जिन अस्पतालों के पास NABH प्रमाणपत्र नहीं है, उन्हें योजना के तहत कैशलेस इलाज जारी रखने में दिक्कत आने की आशंका है।
अलग-अलग पैकेज के लिए प्रमाणन की शर्त
नई व्यवस्था में मेडिसिन पैकेज के लिए फुल NABH मान्यता जरूरी होगी। एंट्री-लेवल NABH वाले अस्पतालों को प्रमाणपत्र की वैधता तक ही अनुमति मिलने की व्यवस्था बताई गई है। अन्य पैकेज के लिए कम से कम एंट्री-लेवल NABH जरूरी होगा। फुल NABH वाले अस्पतालों को डीम्ड इंपैनलमेंट के साथ 15 प्रतिशत अतिरिक्त भुगतान का प्रावधान है, जबकि एंट्री-लेवल NABH वाले अस्पतालों के लिए 10 प्रतिशत अतिरिक्त भुगतान की व्यवस्था रखी गई है।
निजी अस्पतालों की ओर से इस नई शर्त को लेकर पहले से आपत्ति जताई जा रही थी। यूनाइटेड प्राइवेट हॉस्पिटल एसोसिएशन के अध्यक्ष विशाल सिंह पटेल का कहना है कि आयुष्मान के भुगतान पांच से छह महीने से लंबित हैं। ऐसे समय में NABH प्रमाणन पर होने वाला अतिरिक्त खर्च निजी अस्पतालों के लिए परेशानी बढ़ा सकता है। प्रमाणपत्र की अनिवार्यता और खर्च को लेकर अस्पताल संचालकों ने समाधान की मांग रखी है।
अस्पतालों ने बहिष्कार की चेतावनी दी
अस्पताल संचालकों का कहना है कि पहले से लंबित भुगतान के बीच नई प्रमाणन प्रक्रिया का खर्च संभालना मुश्किल हो सकता है। एसोसिएशन की ओर से मांगों का समाधान नहीं होने पर 8 अक्टूबर से प्रदेश में आयुष्मान योजना का बहिष्कार करने की बात कही गई है। यानी जिन अस्पतालों की संबद्धता इस नई शर्त से प्रभावित होगी, वहां योजना के लाभ को लेकर आगे परेशानी बढ़ सकती है।
अप्रैल में भी 126 अस्पतालों की संबद्धता समाप्त की गई थी। ऐसे में निजी अस्पतालों की चिंता केवल प्रमाणपत्र हासिल करने तक सीमित नहीं है, बल्कि लंबित भुगतान और नए खर्च दोनों को लेकर है। नई व्यवस्था के लागू होने के बाद अब यह देखना होगा कि प्रमाणन की कमी वाले अस्पतालों की संबद्धता और योजना के तहत इलाज की व्यवस्था किस तरह आगे बढ़ती है। इस पूरे बदलाव का असर मरीजों और निजी अस्पतालों दोनों पर पड़ने की बात सामने आई है।
