शाही मस्जिद विवाद: हाजी हारून बोले- आठ लोगों की सहमति पूरे समाज का फैसला नहीं, कोर्ट में सही तथ्य रखें
आठ लोगों की सहमति पर उठाया सवाल
भोपाल में शाही मस्जिद विवाद को लेकर जमीयत उलमा मध्य प्रदेश के अध्यक्ष हाजी मोहम्मद हारून ने प्रशासन और अदालत में रखे गए तथ्यों पर सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि शाही मस्जिद को महाकाल मंदिर के बिल्कुल करीब बताकर कोर्ट को गुमराह किया गया है। उन्होंने दावा किया कि मस्जिद और मंदिर के बीच काफी दूरी है और सड़क चौड़ीकरण के लिए केवल तीन फीट जगह की जरूरत होने की बात कही गई थी तो दूसरे विकल्पों पर भी विचार किया जा सकता था।
हारून ने कहा कि प्रशासन के साथ करीब आठ लोगों की बातचीत या सहमति को पूरे मुस्लिम समाज की सहमति नहीं माना जा सकता। उनके मुताबिक संवेदनशील मामले में आम लोगों को पूरी स्थिति बताकर भरोसे में लिया जाना चाहिए था। उन्होंने कहा कि अगर किसी तरह की सहमति बनी थी तो आम लोगों को स्पष्ट रूप से बताया जाना चाहिए था कि क्या तय हुआ है, और मस्जिद का कितना हिस्सा प्रभावित होगा। उन्होंने अदालत में मामले की सुनवाई के दौरान मौके की वास्तविक स्थिति और सभी तथ्यों को सही तरीके से रखे जाने की जरूरत भी बताई।
मंदिर और मस्जिद के बीच दूरी पर दावा
हाजी हारून का कहना है कि शाही मस्जिद को महाकाल मंदिर के बिल्कुल करीब बताना सही नहीं है। उनका दावा है कि मस्जिद मंदिर से काफी दूरी पर है। उन्होंने कहा कि यदि सड़क चौड़ीकरण के लिए केवल तीन फीट जगह की आवश्यकता थी, तो प्रशासन को दूसरे विकल्पों पर भी विचार करना चाहिए था। उन्होंने शाही मस्जिद के सामने मौजूद संदल वाली इमारत को भी एक विकल्प बताया। उनके मुताबिक जरूरत पड़ने पर मुआवजा देकर दूसरी संपत्ति ली जा सकती थी और मुस्लिम समाज इसके लिए राशि जुटाने को तैयार था।हारून ने सड़क चौड़ीकरण के लिए रास्ते का डिजाइन बदलने, गलियों को चौड़ा करने या आसपास की दूसरी संपत्तियों को लेने जैसे विकल्पों का भी जिक्र किया। उनका कहना था कि विकास कार्य में मंदिर या मस्जिद को हटाने की बजाय धार्मिक स्थलों को बचाकर रास्ता निकालने की कोशिश होनी चाहिए।
न्यायिक प्रक्रिया को लेकर भी सवाल
हाजी हारून ने कहा कि अदालत में मामले की सुनवाई के दौरान मौके की वास्तविक स्थिति और सभी तथ्यों को सही तरीके से रखा जाना जरूरी है। उन्होंने न्यायिक प्रक्रिया को लेकर भी सवाल उठाए और कहा कि मामले में पहले सिंगल बेंच और फिर डबल बेंच में सुनवाई हुई। उनका सवाल था कि ऐसी क्या जल्दी थी कि मामले को अंतिम न्यायिक स्तर तक जाने का मौका नहीं दिया गया। उन्होंने कहा कि पक्षकारों को उपलब्ध न्यायिक विकल्पों का इस्तेमाल करने का अवसर मिलना चाहिए था। उन्होंने यह भी कहा कि यदि अदालत के सामने पूरी जानकारी रखी जाती तो मामले की तस्वीर अलग हो सकती थी। उनके मुताबिक मामले से जुड़े तथ्यों और मौके की वास्तविक स्थिति को सुनवाई के दौरान सही रूप में सामने रखना जरूरी है।
बातचीत और सहमति को लेकर सवाल
हारून ने प्रशासन और स्थानीय लोगों के बीच हुई बातचीत पर भी सवाल उठाए। उनकी जानकारी के अनुसार करीब आठ लोगों ने प्रशासन से बातचीत की थी। उन्होंने कहा कि अगर कोई सहमति बनी थी तो आम लोगों को स्पष्ट रूप से बताया जाना चाहिए था कि क्या तय हुआ और मस्जिद का कितना हिस्सा प्रभावित होगा। उन्होंने कहा कि मस्जिद की सुरक्षा के लिए लंबे समय से लोग वहां मौजूद थे।
ऐसे में अचानक कार्रवाई की बजाय पहले लोगों को वास्तविक स्थिति समझाई जानी चाहिए थी। उनका कहना था कि सड़क चौड़ीकरण के लिए यदि केवल तीन फीट जगह निकालने की जरूरत थी तो दूसरे विकल्पों पर विचार किया जा सकता था। उन्होंने यह भी कहा कि रास्ते का डिजाइन बदलने, गलियों को चौड़ा करने या आसपास की अन्य संपत्तियों को लेने जैसे विकल्प मौजूद थे। जरूरत पड़ने पर मुआवजा देकर दूसरी संपत्ति लेने की संभावना पर भी उन्होंने बात रखी।
मीनार हटाने के तरीके पर भी सवाल
हाजी हारून ने मस्जिद की मीनार हटाने के तरीके पर भी सवाल उठाया। उनका आरोप है कि जिस हिस्से को मैनुअल तरीके से हटाने की बात थी, वहां मशीनों के इस्तेमाल से मीनार गिर गई और मस्जिद को नुकसान पहुंचा। उनके अनुसार कार्रवाई के तरीके को लेकर भी सवाल उठने चाहिए। उन्होंने कहा कि अगर किसी हिस्से को हटाना जरूरी था तो उसके तरीके और उससे होने वाले नुकसान के बारे में लोगों को स्पष्ट जानकारी दी जानी चाहिए थी। कुल मिलाकर शाही मस्जिद विवाद में हाजी हारून ने सहमति, अदालत में रखी गई जानकारी, सड़क चौड़ीकरण के विकल्प, स्थानीय लोगों से बातचीत और मीनार हटाने के तरीके को लेकर कई सवाल उठाए हैं। खबर में उनके बयानों को उनके पक्ष के रूप में प्रस्तुत किया गया है।
