BRICS डिनर की हिमालयी गुच्छी, 40 हजार रुपये किलो तक कीमत, ऐसे शुरू करें कारोबार
देश की राजधानी दिल्ली में दो दिवसीय BRICS सम्मेलन का आयोजन हो रहा है। आज इसका दूसरा और आखिरी दिन है। कल शनिवार को हुए डिनर में हिमालय की एक बेहद दुर्लभ चीज ने सबका ध्यान खींचा। डिनर में गुच्छी मार्मिक (Gucchi Marmik) नाम की पारंपरिक डिश परोसी गई, जिसमें गुच्छी मशरूम का इस्तेमाल किया गया है। इसकी कीमत हजारों रुपये प्रति किलो होती है।
दरअसल, यह मशरूम भारत के सबसे महंगे और दुर्लभ जंगली खाद्य पदार्थों में शामिल है। इसकी अच्छी क्वालिटी वाली सूखी गुच्छी की कीमत कई बाजारों में 5,000 से 40,000 रुपये प्रति किलो तक है। हालांकि, कीमत क्वालिटी, उपलब्धता और बाजार की स्थिति के हिसाब से काफी बदल सकती है। हिमालय की गुच्छी मशरूम की खेती करके आप बिजनेस शुरू कर सकते हैं। हो सकता है कि कुछ समय में यह मशरूम ट्रेंड में आ जाए। ऐसे में इसकी खेती से आपको अच्छी कमाई हो सकती है।
क्या है गुच्छी मशरूम?
गुच्छी को दुनिया भर में मोरल मशरूम के नाम से जाना जाता है। इसका वैज्ञानिक नाम Morchella esculenta है। यह मुख्य रूप से जम्मू-कश्मीर, हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड के पहाड़ी इलाकों में पाई जाती है। गुच्छी आम बटन या ऑयस्टर मशरूम की तरह बड़े पैमाने पर उगाई नहीं जाती। यह मुख्य रूप से जंगलों में प्राकृतिक रूप से पैदा होती है।
हिमालय के ऊंचाई वाले इलाकों में शंकुधारी जंगल, मिट्टी की स्थिति, नमी, तापमान में बदलाव और बर्फ जैसी कई प्राकृतिक परिस्थितियां इसके उगने के लिए जिम्मेदार होती हैं। कुछ ही हफ्तों का होता है सीजन। गुच्छी की सबसे बड़ी खासियत इसकी दुर्लभता है। इसके उगने का कोई निश्चित तरीका नहीं है और इसकी फसल का मौसम भी बहुत छोटा होता है। आमतौर पर पहाड़ी इलाकों में लोग वसंत के मौसम में कुछ ही हफ्तों के दौरान जंगलों से गुच्छी इकट्ठा करते हैं।
क्यों है इतनी महंगी?
गुच्छी मशरूम को बड़े पैमाने पर व्यावसायिक रूप से उगाना संभव नहीं है। यह जंगल की मिट्टी, नमी, बर्फ पिघलने के पानी और खास तापमान के सही संतुलन से प्राकृतिक रूप से उगती है। स्थानीय पहाड़ी ग्रामीण वसंत ऋतु के दौरान बेहद खतरनाक और ढलान वाले पहाड़ों पर मीलों पैदल चलकर इसे एक-एक करके ढूंढते हैं।
इसका सीजन भी बहुत छोटा, कुछ ही हफ्तों का होता है। ताजी गुच्छी में नमी अधिक होती है। इसे लंबे समय तक सुरक्षित रखने के लिए सुखाया जाता है, जिससे इसका वजन काफी कम हो जाता है। इसलिए सूखी गुच्छी की प्रति किलो कीमत आसमान छूने लगती है। इसमें मिट्टी जैसी खुशबू, गहरा उमामी स्वाद और हल्की मस्की सुगंध होती है, जो किसी भी व्यंजन को शाही स्वाद दे देती है। इसका इस्तेमाल गुच्छी की ग्रेवी, चावल, सॉस और कई तरह के खास व्यंजनों में किया जाता है।
कैसी होती है गुच्छी?
गुच्छी मशरूम को उसके खास छत्ते जैसी जालीदार टोपी से आसानी से पहचाना जा सकता है। इसका रंग हल्के पीले से लेकर गहरे भूरे रंग तक हो सकता है। इसका तना आमतौर पर हल्के रंग का और अंदर से खोखला होता है। हिमालयी क्षेत्रों में यह लोकमान्यता काफी प्रचलित है कि वसंत के मौसम में जब पहाड़ों पर कड़क के साथ बिजली गिरती है, तब जमीन से गुच्छी मशरूम बाहर निकलती है। हालांकि वैज्ञानिक रूप से इसका कोई सीधा प्रमाण नहीं मिला है।
कैसे शुरू करें गुच्छी का कारोबार?
हिमालय की गुच्छी मशरूम को बड़े पैमाने पर व्यावसायिक रूप से उगाना संभव नहीं है। यह जंगल की मिट्टी, नमी, बर्फ पिघलने के पानी और खास तापमान के सही संतुलन से ही प्राकृतिक रूप से उगती है। स्थानीय पहाड़ी ग्रामीण वसंत ऋतु के दौरान बेहद खतरनाक और ढलान वाले पहाड़ों पर मीलों पैदल चलकर इसे एक-एक करके ढूंढते हैं।
इसका सीजन भी बहुत छोटा होता है। ताजी गुच्छी में नमी अधिक होती है। इसे लंबे समय तक सुरक्षित रखने के लिए सुखाया जाता है, जिससे इसका वजन काफी कम हो जाता है। इसलिए सूखी गुच्छी की प्रति किलो कीमत आसमान छूने लगती है। इसमें मिट्टी जैसी खुशबू, गहरा उमामी स्वाद और हल्की मस्की सुगंध होती है। इसका इस्तेमाल ग्रेवी, चावल, सॉस और कई तरह के खास व्यंजनों में किया जाता है। हिमालय की गुच्छी की दुर्लभता ही इसकी कीमत का बड़ा कारण है।

