ट्रांसजेंडर एक्ट पर सुप्रीम कोर्ट का नोटिस: क्या सर्जरी से महिला बने व्यक्ति को मिलेंगे महिलाओं के अधिकार?

ट्रांसजेंडर एक्ट नोटिस जारी होने के बाद सुप्रीम कोर्ट भवन की फाइल तस्वीर

जैविक महिलाओं के कानूनी संरक्षण पर छिड़ी कानूनी बहस

क्या प्राकृतिक और बायोलॉजिकल तौर पर पुरुष के रूप में जन्मा कोई व्यक्ति, लिंग परिवर्तन (जेंडर रीअसाइनमेंट सर्जरी) करवाने के बाद केवल जैविक महिलाओं के लिए आरक्षित संवैधानिक और कानूनी अधिकारों का पूर्ण दावा कर सकता है? इस अत्यंत जटिल और नीतिगत सवाल को लेकर एक प्रमुख महिला अधिकार संगठन ने देश की सर्वोच्च अदालत का दरवाजा खटखटाया है। महिला संगठन ‘विमेंस डिक्लेरेशन इंटरनेशनल इंडिया’ द्वारा दायर की गई इस विशेष जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने केंद्र सरकार को औपचारिक नोटिस जारी कर विस्तृत जवाब तलब किया है। इस विधिक कदम के साथ जारी हुआ ट्रांसजेंडर एक्ट नोटिस अब देश में लैंगिक पहचान और महिलाओं के मूल अधिकारों के बीच नए विमर्श को जन्म दे रहा है।

ट्रांसजेंडर कानून 2019 की धारा 7 को दी गई चुनौती

याचिकाकर्ता संगठन ने ट्रांसजेंडर व्यक्ति (अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम, 2019 की धारा 6 और उससे जुड़े नियम 7 की वैधानिकता को सीधे चुनौती दी है। याचिका के अनुसार, वर्तमान कानून के ये विवादास्पद प्रावधान बायोलॉजिकल पुरुषों को केवल सर्जरी करा लेने के आधार पर आधिकारिक सरकारी दस्तावेजों में स्वयं को ‘महिला’ के रूप में दर्ज कराने की खुली वैधानिक छूट देते हैं।

याचिका में दलील दी गई है कि मौजूदा प्रशासनिक व्यवस्था जेंडर आइडेंटिटी को जैविक सेक्स (सेक्स एट बर्थ) के समकक्ष मान रही है। इसके चलते जन्म के समय पुरुष रहे व्यक्ति आसानी से सरकारी दस्तावेजों में महिला की पहचान हासिल कर रहे हैं, जिससे प्राकृतिक महिलाओं के लिए बने आरक्षण, सुरक्षा कानून, खेल प्रतियोगिताएं और सामाजिक कल्याणकारी योजनाओं के लाभ सीधे तौर पर प्रभावित और कमजोर हो रहे हैं। अदालत का ट्रांसजेंडर एक्ट नोटिस इसी संतुलन की समीक्षा के लिए जारी किया गया है।

2014 के ऐतिहासिक नालसा (NALSA) फैसले पर पुनर्विचार की मांग

इसके अलावा याचिका में सुप्रीम कोर्ट के वर्ष 2014 में दिए गए ऐतिहासिक ‘नालसा बनाम भारत सरकार’ (NALSA Judgment) के फैसले पर भी पुनर्विचार करने की मांग उठाई गई है। 2014 के उसी ऐतिहासिक निर्णय के तहत ट्रांसजेंडर व्यक्तियों को अपनी सेल्फ-आइडेंटिफाइड जेंडर पहचान को कानूनी रूप से मान्यता देने का अधिकार प्रदान किया गया था।

याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि आत्म-पहचान के इस अधिकार को जैविक महिलाओं के अधिकारों की कीमत पर लागू नहीं किया जाना चाहिए। संसद द्वारा बनाए गए कानूनों और अदालती व्याख्याओं में महिला की स्पष्ट परिभाषा तय होना अनिवार्य है। सुप्रीम कोर्ट ने मामले की गंभीरता को स्वीकार करते हुए सभी संबंधित पक्षों को नोटिस का जवाब देने को कहा है। इस प्रकार ट्रांसजेंडर एक्ट नोटिस आने वाले समय में देश के संवैधानिक एवं सामाजिक ताने-बाने को नई कानूनी दिशा दे सकता है।

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